Friday, April 18, 2008
Lage Raho Munnabhai
शहर की इस दौड में दौड के करना क्या है? जब येहीं जीना है दोस्तों तो फिर मरना क्या है? पहेली बारिश में train late होने कि फ़िकर है। भूल गये भिगते हुए टहेलना क्या है? Serials के किरदारों का सारा हाल है मालूम पर माँ का हाल पुछने की फ़ुरसत कहाँ है? अब रेत पे नंगे पाओं टहेलते क्यूँ नहीं? 108 हैं चनेल फिर दिल बहेलते कयुँ नहीं? Internet से दुनिया के तो touch में हैं, लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं। Mobile, Landline सब की भरमार है, लेकिन जिगरी दोस्त तक पहुचें ऐसे तार कहाँ है? कब डुबते हुए सुरज को देखा था, याद है? कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है? तो दोस्तों शहर कि इस दौड में दौड के करना क्या है। जब यहीं जीना है तो फिर मरना क्या है?
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